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निम्नलिखित काररो से सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटस होने की संभावना बढ़सकती है :

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  • सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस को जानिए
  • प्रेस सूचना
  • होमियोपेथी के बारे मे जानिए

हमारी वेबसाईट पर आपका स्वागत है । यहा पर हम सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस  (Cervical Spondyliti) को समझेगे और इसके होमियोपेथिक उपचार के बारे मे जानेगे । आपने यह अनुभव किया होगा कि जब आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस  की तकलीफ हुइ होगी तब आपको औपचारिक उपचार से संतोषजनक आराम नही मिला होगा दिन रात पीड़ानाशक दवाईयो का सेवन करना यह इस बीमारी का सही उपाय नही है । यहा पर होमियोपेथिक उपचार मरीज की महत्वपूर्ण सहायता कर सकता है ।

सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस  गर्दन की रीढ़की हड्डी की अपकर्षक (Degenerative) बीमारी है और गर्दन मे दर्द होने का यह एक मुख्य कारण माना जाता है । महिलाओ की तुलना मे यह बीमारी पुरुषो मे ज्यादा पाई जाती है । बढ़ती उम्र के साथ साथ इस बीमारी के उभरने की संभावना भी बढ़ती जाती है । ७० वर्ष की आयु के लगभग १००ज्ञ् पुरुषो मे और करीब करीब ९६ज्ञ् महिलाओ मे यह बीमारी पाई जाती है । होमियोपेथी से इस बीमारी की प्रगति को भी नियंत्रण मे रखा जा सकता है ।

सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस  (Cervical Spondylitis) को जानिएँ

  • सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस  क्या है ?   
  • रोग के लक्षण
  • रोग के कारण
  • औपचारिक उपचार           
  • होमियोपेथिक उपचार
  • क्या करना है क्या नही करना है
  • मरीज के लिए गर्दन के व्यायाम

सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस  क्या है ?

सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस गर्दन की रीढ़की हड्डी की अपकर्षक बीमारी है । बढ़ती आयु से रीढ़की हड्डी उसके जोड़ और जोड़ो के बीच उपस्थित गद्दी मे बदलावो के कारण इस बीमारी के लक्षण उभरते है । बगैर किसी घोट के बाजुओ में कमजोरी महसूस होना और गर्दन मे रिंतर रहने वाली ऐठन का मुख्य कारण सर्वाइकल स्पॉन्डिल्यासीस है ।

यह देखा गया है कि ४० वर्ष से ज्यादा आयु वाले व्यक्तियो मे रीढ़की हड्डी के बीच की गद्दी निर्जालित हो जाती है इससे वे ज्यादा संपीडय बन जाते है और उनका लचीलापन भी कम हो जाता है; और उनमे धातु जमा होने लगते है । ४० वर्ष से ज्यादा आयु के लोगो मे यह सभी महत्वपूर्ण बदलाव एक्सरे मे दिखाई पड़ते है पर इनमे से बहुत कम लोगो मे रोग के लक्षण उभरते है । ध्यान देनेवाली बात यह भी है कि कई बारयह बदलाव ३० वर्ष की आयु मे भी दिखाई देते है पर इन चिन्हो की वजह से उपचार शुरु करना जुरुरी नही है यदि रोग के लक्षण उभरे ना हो ।

ऊपर दिए बदलावो के कारण नस पर दबाव आता है जिसके फलस्वरुप मरीज Radiculopathy(दर्द संवेदनशून्यता, झुनझुनाहट, कमजोरी और Refiexes या कम होना) से पीिड़त हो जाते है ।जब दबाव मेरुदण्ड पर पड़ता है तब मरीज CSM(Cervical spondylotic Myelopathy)  से पीिड़त होता है जिसमे हाथ पैरो मे कमजोरी हो जाती है और संवेदना भी कम हो जाता है ।

रोग के लक्षण

गर्दन और कधों मे बार बार दर्द होना यह दर्द चिरकालिक या प्रासंगिक हो सकता है । बीच बीच मे यह दर्द अपने आप से कम भी हो जाता है ।

अन्य लक्षण

  • गर्दन में दर्द के साथ साथ मासपेशियो मे अकड़न आ जाती है । कई बार यह दर्द तेजी से कंधो और सिर की और फैलता है । कई करीजो मे वह दर्द पीठ मे और कंधो से होकर हाथो और उंगलियो तक भी फैल जाता है ।
  • सिर के पिछले हिस्से मे दर्द होता है । वह दर्द कभी गर्दन के निचले हिस्से तक या शीर्ष तक फैलता है ।
  • बगैर किसी घोट के गर्दन, कन्धे और सनसनी होना यह कुछ अन्य लक्षण है ।
  • कभी कभी असामान्य लक्षण उभरते है जेसे कि छाती मे दर्द होना और मरीज इस दर्द को कभी कभी गलती मे हृदय का दर्द मान लेता है ।
  • Myelopathy से पीड़ित मरीज को हाथो से लिखने मे कठिनाई होती है और हाथो मे कमजोरी और असामान्य इन्द्रियज्ञान होता है ।


Sensory implement related to cervical spondylitis


जाच के वक्त पाए जाने वाले चिन्ह :

  • मरीज का परिक्षण करते समय यह देखा गया है कि उसके गर्दन को घुमाने की क्षमता कम हो जाती है ।
  • गर्दन की मासपेशियों में अकड़न रहती है ।
  • गंभीर मरीजो में गर्दन और हाथो की मांसपेशियो में कमजोरी और असामान्य इन्द्रियज्ञान होता है । प्रभावित क्षेत्र ऊपर दिए गए चित्र में दिखाई दिए गए है ।

 


रोग के कारण

सर्वाइक्ल स्पान्डिलाइटस रीढ़की हड्डी, हड्डियो के बीच के जोड़ और गद्दी मे घिसाव आने से होता है । ज्यादातर यह बदलाव ४० वर्ष से ज्यादा उम्रवाले व्यक्तियों में पाए जाते है ।

Cervical spondylitis ke kya karan hai?

निम्नलिखित काररो से सर्वाइकल स्पान्डिलाइटस होने की संभावना बढ़सकती है :

  • व्यवसाय संबंधित कारण : - सिर पर बार बार भारी वजन उठाना, नृत्य करना कसरत करना (Gymnastics)
  • कई परिवारों मे सर्वाइकल स्पान्डिलाइटस होने कि प्रवृति होती है । आनुवंशिक कारण की उपेक्षा नही की जा सकती ।
  • धूम्रपान से भी खतरा होता है ।
  • जन्मजात काररो से भी खतरा रहता है । उधाहरण: Down Syndrome, Cerebral palsy, Congenital fused spine इत्यादि ।
  • लगातर सिर झुकाकर या गर्दन झुकाकर काम करना ।
  • एक ही स्थान पर बैठकर लगातर काम करना उदहारण कम्प्युटर के स्क्रीन/पदें को लगातर ताकना ।
  • लंबी दूरी का प्रवास करना बैठे बैठे सो जाना ।
  • टेलीफोन को कन्धे के सहारे रखकर लंबे समय तक बात करना ।
  • लगातार गर्दन को एक ही स्थिति/अवस्था मे रखना उदाहरण: टी.व्ही. देखते समय, वाहन चलाते समय इत्यादि ।
  • वृद्धावस्था

रोग निदान

रोग के पहचानने के लिए वैज्ञानिक मूल्यांकन बहुत आवश्यक है । निदान का पुष्टिकरण नीचे दिए गए जांच से किया जा सकता है।

  • गर्दन का एक्सरे (X-ray)  : रीढ़की हड्डी मे उभरे हुए उकसान नजर आते है ।
  • MRI (Magnetic Resonance Imaging) : की मदद से निदान निश्चित किया जा सकता है और यह भी पता चल जाता है कि नस पर दबाव पड़ रहा है या नही ।
  • EMG (Electromyelography) की मदद से यह जांचा जाता है कि नसो की जड़ो को कोई नुकसान हुआ है या नही ।

औपचारिक उपचार

  • दर्द कम करने वाली दवाईयों (NSAIDs) का सेवन करना
  • मांसपेशियों की अकइन को कम करने वाली दवाईया |
  • गले का पट्टा जिससे गर्दन में हलचल को सीमित रखा जाता है।
  • Cortisone Injections
  • शल्यक्रिया की मदद से नस पर पड़ते हुए दबाव को कम किया जाता है।
  • भौतिक चिकित्सा (Physiotherapy)-औपचारिक उपचार और शल्यक्रिया के साथ साथ Physiotherapy दी जाती है जिससे मरीज को कम अरसे तक और कम मात्रा में दवाई खानी पड़ती है। Physiotherapy ीमारी को चिरकालिक बनने से रोक सकता है और उसकी पुनरावृत्ती को भी कम कर देता है।

होमियोपेथिक उपचार

होमियोपेथिक उपचार करने से सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटस के मरीज को बहुत आराम मिल सकता है। बीमारी के शुरूआत में ही उपचार कराने पर परिणाम ज्यादा संतोषजनक होते है। चिरकालिक मरीजों में भी जम नस पर दबाव के कारण लक्षण उभरते हैं तो इनसे यह आराम दिलाने में मददगार होता है एवं भीमारी को और भी आगे बढ़ने से रोकता है। जिन मरीजों में बिमारी ज्यादा संगीन हो गई हो और रीढ़ की हड्डी में बदलाव आ गए हों , उन मरीजों के दर्द में होमियोपेथिक उपचार से कम किया जा सकता है। जिन मरीजों में रीढ़ की हड्डी में ज्यादा संरचनात्मक परिवर्तन न हुए हों उनमें होमियोपेथिक उपचार ज्यादा सफल रहता है। होमियोपेथिक उपचार पूर्ण रूप से सुरक्षित है और इस उपचार से कोई भी दुष्परिणाम नहीं होते हैं।

यह जानना और समझना जरूरी है कि सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटस एक उम्र के साथ बढ़ते जाने वाली बीमारी है। इस बीमारी के कारण रीढ़ की हड्डी में होने वाले बदलावों को फिर से उनके मूल रूप में नहीं लाया जा सकता है। पर इन बदलावों के कारण होने वाले। लक्षणों पर जरूर नियंत्रण पाया जा सकता है और इन बदलावों को और भी आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास होमियोपेथिक उपचार से किया जा सकता है। होमियोपैथिक उपचार और सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटसः होमियोपेथी एक वैज्ञानिक चिकित्सा समधित उपचार प्रणाली है। होमियोपेथी के मूल सिद्धांतों के अनुसार सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटस का उपचार करते समय इसको पूर्ण रूप से समझा जाता है। यह करने के लिए बीमारी के लक्षणों को बारीकी से जाँचा और समझा जाता है और साथ साथ मरीज़ को समझने में भी इतना ही महत्व दिया जाता है।

क्लासिकल होमियोपेथी (Classical Homeopathy) के अनुसार मरीज को एक व्यक्तिगत दयाई दी जाती है। यह करने के लिए हर मरीज़ की बारीकी से जाँच की जाती है। और उसे पूर्ण रूप से समझा जाता है। मरीज की जीवन शैली क्या है, उसका व्यक्तित्व कैसा है, उसका मनोभाव कैसा है, मरीज की खाने के आदते कैसी है, उसके परिवार में किन किन बीमारियों की प्रवृत्ति है, इत्यादी। इन सभी बातों का मूल्यांकन करने के बाद मरीज को एक व्यक्तिगत दवाई दी जाती है।

व्यक्तिगत दयाई का महत्त्य क्या है? व्यक्तिगत दवाई देने का महत्त्व इसी बात में है कि इसमें मरीज के पूर्ण रूप से समझा जाता है; उसके शरीर और उसके व्यक्तित्व दोनों को उतनी ही बारीकी से जाया और समझा जाता है । इसके आधार पर दी गई दवाई शरीर और मन का संतुलन बनाए रखती है और यह व्यक्तिगत दवाई शरीर की बीमारी से लड़ने के क्षमता को भी बढ़ाती है; इससे मरीज़ को एक लगे अर्से तक आराम मिलता है।

क्या करना है, क्या नही करना है।

सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटस के मरीज़ को क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए।

क्या करना चाहिएः

  • गर्दन की मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए और गर्दन को लोचदार बनाने के लिए
    नियमित व्यायाम करना चाहिए।
  • सोने के लिए कड़क गद्दा और पतले तकिये का उपयोग करें।
    दिन भर गर्दन को आधार देने वाला विशेष पट्टा पहनें।
  • अगर आप लेटे हों और उठना चाहें तो पहले एक तरफ मुड़ जाएँ और फिर उठे, | झटके से ना उठे। • नियमित पैदल सैर पर जाएँ।
  • आप अगर पान चला रहे हों, टी.व्ही. देख रहे हों, या ऐसा कोई काम कर रहे हों। जिससे आप अपना सिर एक ही स्थिती में ज़्यादा समय रखते हों तो आपको बीच में थोड़े समय तक आराम करना चाहिए जिससे गर्दन की मांसपेशियों में थकावट और जकड़न ना आए।
  • वाहन चलाते वक्त 'सेफ्टी बेल्ट का उपयोग करें और गर्दन का पट्टा भी पहनें।
  • जब दर्द बहुत तीव्र हो जाए तब मरीज़ को पूरा आराम करना चाहिए और कोशिश करनी | चाहिए कि गर्दन बिल्कुल ना हिले ।

क्या नहीं करना चाहिए:

  • लंबे समय तक एक ही स्थिती में न बैठे।
  • अगर आप को दर्द हो तो ऐसे व्यायाम ना करें जिनसे गर्दन पर ज़ोर पड़े।
  • सिर और कर्धा पर वजन ना उठायें।
  • गड्ढे वाले रास्तों से प्रवास ना करें।
  • गर्दन को एक तरफ मोड़कर ज्यादा समय तक काम ना करें।
  • सोते समय मोटे और ज्यादा तकियों का उपयोग ना करें।
  • पेट के बल ना सोयें।।
  • अगर मुड़ना हो तो गर्दन को घुमाकर पीछे ना देखें, पूरी तरह खुद घूम कर देखें। ।
  • आपको दर्द हो तो रीढ़ की हड्डी की मालिश ना कराएँ।

गलत ढंग से बैठना किसे कहते है?

  • सिर को सतर आगे झुकाना
  • कंधों को ऊपर और आगे झुकाकर बैठना
  • सीना आगे की तरफ मोड़कर बैठना
  • कमर आगे सरकाकर बैठना।
  • कमर, घुटने और एड़ियों को मोड़ कर बैठना
     

मरीज के लिए गर्दन के व्यायाम

सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटस के मरीज के लिए गर्दन के व्यायामः

Disclaimer: नीचे बताए गए व्यायाम आप अपने डॉक्टर के बताए हुए व्यायाम के बदले में ना करे। व्यायाम करते समय अगर आपको दर्द हो या किसी भी तरह का कष्ट हो तो आप तुरंत व्यायाम करना बंद करें और डॉक्टर से संपर्क करें। हमारी सलाह है कि आप यह व्यायाम एक डॉक्टर या शिक्षक के निरीक्षण में करें।

यह व्यायाम और योगासन आपका दर्द कम करने में मदद करेंगे और गर्दन की मांसपेशियों को अधिक ताकतवर बनायेंगे और उन्हें अधिक लोचदार बनायेंगे।

Isometric Exercises: ये गर्दन की मांसपेशियों की शक्ति बढ़ाते है। इन व्यायामों में रीढ़ के जोड़ों को बहुत कम या । बिलकुल नहीं हिलाया जाता है। यहाँ पर हाथों से प्रतिरोध दिया जाता है। यह व्यायाम सीधा गैठकर किए जाते है।

A) Neck Extension: -आप अपनी हथेलिओं को सिर के निचले हिस्से पर रखें और हाथों से प्रतिरोध करते हुए। अपने सिर और गर्दन के पीछे मुड़ने के प्रयास को रोकिए।

B) Side Bending: सीधे बैठकर अपनी हथेली को कान के ऊपर रखें और हलका दबाव दे, इस दगाव का प्रतिरोध करें और सिर को ना हिलने दें।


C) Neck Flexion: अपनी उंगलिओं को अपने माथे पर आँखों के बीच रखें और पीछे की ओर हलका सा दगाव । दें; अपने सिर और गर्दन को न हिलने देते हुए इस दबाव का प्रतिरोध करें।


Flexibility Exercises: यह व्यायाम गर्दन में आयी हुई अकड़न को कम करते हैं और उसे ज़्यादा लोचक बनाते है।

A) Neck Flexion: सीधे बैठकर अपने सिर को आगे झुकाईए और ठुड्डी से सीने को छूने की कोशिश कीजिए। ५ सेकन्ड़ तक ऐसे ही सर को रखें और फिर सिर सीधा करें। ८-१० बार यह व्यायाम दुहराईए।


B) Neck Extension: सीधे गैठकर अपने सिर को पीछे की ओर मोड़िए जिससे कि आपकी ठुड्डी ऊपर की तरफ हो जाए, फिर सीधे हो जाएं और यह ८-१० बार दुहराईए ।


C) Neck Rotation: पहले सीधे बैठे फिर सिर घुमाकर दाहिनी और देखें; फिर सीधा देखें और फिर गायी और देखें और यह कम आप ८-१० बार दुहराई।

D) Neck Side Bend: सीचे बैठकर सिर को एक तरफ झुकाईए जिससे कि आप का गाया कान गाये कंधे से और मुडे, फिर सिर सीधा करें। यह क्रम करते समय गर्दन को गोल ना घुमाएं और कधों की ऊपर कान की तरफ ना उठाएं। यह व्यायाम ८-१० बार करे।



Yogasans:

नीचे दिए गए आसन सामान्य रूप से सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटस से पीड़ित मरीजों को करने के लिए कहा जाता है। हमारी सलाह है कि आप यह आसन एक योग्य शिक्षक की देखरेख में ही करें।

  •  भुजंगासन
  •  नौकासन
  •  धनुरासन

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